
हाल ही में हुई एनडीए (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन) की बैठक में सभी 33 पार्टियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एकजुट होकर काम करने का संकल्प लिया है। आगामी 2019 लोकसभा चुनावों में अपनी जीत एक बार फिर कायम करने के लिए एनडीए के शीर्ष नेताओं ने प्रधानमंत्री की नीतियों की सराहना करते हुए उनकी अगुवाई में आगामी चुनाव लड़ने का फैसला किया है। एनडीए की मानें तो पाकिस्तान की उग्रता और चीन की चपलता के खिलाफ भारत को अपनी नीतियां मजबूत करने की सख्त आवश्यकता है। ऐसे में प्रधानमन्त्री मोदी के “मजबूत” नेतृत्व की देश को सख्त आवश्यकता है।

इस मीटिंग के बाद ही विपक्षी दलों में भी सुगबुगाहट तेज़ हो गयी है। इस मामले में सबसे ज़्यादा सक्रिय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दिखीं। उन्होंने प्रशासनिक और राजनैतिक दृष्टि से प्रधानमंत्री मोदी के साथ बांग्लादेश से जुड़े हुए मसलों के ऊपर चर्चा की। प्रधानमंत्री से हुई मीटिंग में ममता ने केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्न योजनाओं (जैसे कि मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन आदि) के लिए 10,000 करोड़ रुपये की मांग रखी। इस सन्दर्भ में प्रधानमंत्री ने ममता बनर्जी को धन का अभाव दूर करने का आश्वासन दिया। हालांकि ये सब जानते हैं कि ममता जी की प्रधानमन्त्री तथा अन्य भाजपा नेताओं से कुछ खास बनती नहीं है। प्रधानमंत्री से मिलने के बाद आगामी 2019 के चुनाव में जीत का सपना संजोये ममता ने कांग्रेस, एनसीपी, बीजेडी और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ मिलने का फैसला किया।

भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने के लिए ममता ने विभिन्न पार्टीयों के शीर्ष नेताओं, जैसे अहमद पटेल गुलाम और गुलाम नबी आजाद (कांग्रेस), एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक तथा दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ मुलाकात की। ये बैठकें राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि विभिन्न गैर-भाजपा पार्टियों ने हाल में हुए पांच राज्यों के चुनावों में मिली करारी हार के बाद भाजपा के भगवा रंग को रोकने हेतु इंद्रधनुषी गठबंधन करने का फैसला किया है।
दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि ये गठबंधन भारतीय संविधान या जनता के पक्ष में नहीं अपितु सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अपनी जीत दर्ज करने हेतु किया गया है। इसके अतिरिक्त सभी यूपीऐ (संयुक्त प्रगतशील गठबंधन) के नेताओं ने चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनाव में ईवीएम मशीन को हटा के बैलट पेपर रखने की पेशकश करने का निर्णय लिया। अब देखना ये है की भाजपा, कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बीच चल रही रस्साकशी का असर जनता पर क्या पड़ता है। ये तो हमें आगामी चुनाव नतीजों को देख के ही पता चलेगा।

